न्याय के देवता शनिदेव – शनिजयंती के दिन कैसे प्रसन्न करें

ज्येष्ठ मास की अमावस्या शनि जयंती के रूप में  मनाई जाती है  इस बार यह 28 मई को है | न्याय प्रिय शनि देव निसपक्ष होकर न्याय करते है| वह अपने भक्तों को अभयदान देने वाले देवता है| वह सभी प्राणियो को उनके कर्मों अनुसार फल देते है| जिन पर शनि देव की किरपा होती है उन्हे हर प्रकार की सिद्दियाँ प्राप्त होती है और उनके सभी कष्टों को वह हर लेते हैं| शनि देव जिस पर किरपा करते है उनको रंक से राजा ब्ना देते है और जिस पर क्रोधित हो जाएँ उसे राजा से रंक बना देते है |


ज्योतिषशास्त्रा के अनुसार शनि नवग्रहों में एक और सभी ग्रहों में अत्यधिक कठोर व शक्तिशाली देवता है|साहनी पक्ष रहित होकर पापियों को सज़ा देते है और पुण्या करम करने वालो को हर प्रकार की सुख सुविधाएँ ,यश ,कीर्ति व वेबव प्रदान करते है|

कैसे मनाएँ शनि जयंती – इस दिन शनि देव की आराधना ,स्तुति ,साधना व अनुष्ठान करने से शनि देव प्रसन्न होते है| जो लोग शनि देव की पूजा व व्रत आदि करते हैं,उन पर जब शनि की दशा आती है तो उन्हे कशट झेलना नही पड़ता| शनि देव को प्रसन्न करने के लिए पीपल के पेड़ पर प्रतिदिन नियमित रूप से जल चड़ाएं| यदि प्रतिदिन नही चड़ा सकते तो शनिवार को जल ज्रूर चड़ाएं| रत को पीपल के पेड़ के नीचे सरसो के तेल का दीपक जलना चाहिए|
श्री सुन्दर कांड और श्री हनुमान चालीसा का पाठ करना उत्म्फलदायक होता है ,शनि जयंती पर 27 दिन तक प्रतिदिन शनि स्त्रुत का पाठ ,रुद्राक्ष की माला से महामृत्युंज मंत्र का जाप करना चाहिए| काले तिल ,काले माह्ं ,उड़द की दल से बनी वस्तुओं को दान करें| शनि जयंती पर भगवान शनि देव का व्रत करना अती उतम है| अपनी राशि के अनुसार ही काले तिल , उनी वस्त्र ,कंबल ,चमड़े के जूते ,तिल का तेल लोहा , काली गाय , भेंस ,तांबे और सोने का दान करे |शनि जयंती पर काले गुलाब जामुन को प्रसाद भोग ल्गा कर बाटना चाईए |

 

धार्मिक क्रियाकलापो का साइंटिफिक महतव व योगदान

हमारा पूरा ब्रामंड उर्जा के परवाह पर आधारित है | उर्जा अलग -अलग रंगो की क्म्पन.स्क्ती से मिलकर कहीं अधिक कहीं कम ,कहीं सकारात्मक , कहीं नकारात्मक रूप में परवाह करती है | यदि उर्जा का परवाह हमारे शरीर , घर , मंदिर या किसी भी स्थान पर असंतुलित होता है, तो वह किसी भी सजीव वास्तु के लिए शारीरिक या मानसिक असंतुलन पैदा करने का कारण बनता है| प्राचीन समय से हमारे ऋषि-मुनियो को हर प्रकार की उर्जा के बारे मे पता था,इसलिए उन्होने हमारी पूजा के क्रियाकलापो या धार्मिक क्रियाकालपो को इस तरह से बताया की वह हमारी शारीरिक व मानसिक उर्जा को सकारात्मक तरीके से संतुलित रखता है|

इसी प्रकार कुछ ऐसे पशुओ व पेड़ो को पहचानकार जिनका उर्जा क्षेत्र मानव के उर्जा क्षेत्र दोगना या चुगाना बड़ा होकर धार्मिक क्रिया में शामिल किया गया था| यदि हम नकारात्मक विचार रखते है तो मानसिक अस्तरिता का होते है और हमारे शरीर की क्म्पनस्कती मे बदलाव ला सकती है|न केवल हमारे शरीर को बलकि हमारे घर के वातावरण को भी परभावित करती है क्योंकि ये नकारात्मक विचार एक क्म्पन्स्कति के रूप में परवाह करती है|वास्तु मे भी अधिकतम सरनचनात्मक वास्तु पर ही ध्यान देते है जो की केवल 20 % ही प्रभावित करता है, जबकि हमारी मानसिक स्थति उस दोष की त्रिवता को दोगना कर देती है| हमारे नकारात्मक विचार क्म्पनस्कतीके रूप में उसमे जोड़ते रहते है| इस्र प्रकार रत्नो के विषया के बारे मैं भी बताया गया है|यही सकारात्मक सोच तन्त्र-मंत्र और यंत्र के बारे में भी रखनी चाहिए|

संतान सुख न होने के कारण

अपने वंश को आगे बढ़ाने की इच्छा हर मानव के मान मे होती है | भारतीय संस्कृति में विवाह संस्कार के मूल में ही यही भावना निहित है |चिकित्सकीय दृष्टि से स्त्री तथा पुरुष के स्वस्थ रहने के बाद भी संतान की उत्पाती नही हो पाती है | तब म्नुष्य अपने पूर्व जन्म में किए गये कर्मों को इस कष्ट का कारण मानता है तथा देवग्यों का आश्र्य ग्रहन करता है | अगर जातक की कुंडली में निम्नलिखित संतान बाधा हो तो जातक को संतान सुख में बाधा होती है( प्रमुखत: पंचम भाव के स्वामी, पंचमस्थ ग्रह, उनका स्वामित्व तथा संतान कारक वृहस्पति की स्तिथि पर सम्यक रूप से विचार करने से ज्ञात होता है कि संतान होगी या नही |

यधपि वृहस्पति पुत्र का कारक है, परन्तु इनका पंचम स्थान में स्थित  होना हानिकारक है | पंचम भाव में धनु और मीन का वृहस्पति सवग्रेही होता है, मकर का नीचस्थ तथा कर्क का उच्च | परन्तु इन सब स्तिथियों में पंचमस्थ वृहस्पति हानिकारक है | मीन का वृहस्पति में रहने से बहुत काम संतान होती है, धनु का वृहस्पति में रहने से बहुत चिंता के बाद संतान होती है, कर्क और कुम्भ का वृहस्पति में रहने से हमेशा संतान होती ही नहीं है और यदि पंचमस्थ वृहस्पति शुभ-दृष्ट न हो तो पुत्र का अभाव होता है |इसके इलावा एक सिद्धांत ये भी है की यदि किसी भाव का कर्क उसी भाव में स्थित है तो अशुभ फल फल देता है| वृहस्पतिकी पंचम भाव में स्तिथि  कुछ परिस्तिथियों में अति शुभ है परन्तु पुत्र के लिए अशुभ |