नाग पूजन का पर्व- नाग पंचमी

श्रावण माह में भगवान की कृपा पाने के लिए लोग पूरा महीना अनेक वर्त,अभिषेक,हवन,यग एव धार्मिक अनुष्ठान करते है| इस बार सावन माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी 1 अगस्त को है जिसे नाग पंचमी के रूप में नाग देवता की पूजा करके मनाया जाता है|


भारतीय संस्कृति में प्रभु द्दारा रचित सारे सृष्टि की रक्षा के लिए अनेक जीवों की विभिन्न प्रकार से बड़े श्रदा भाव से पूजा की जाती है| सावन माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी के दिन नागों का पूजन करने का विधान है|ऐसा करके लोग नागदेवता को प्रसन्न करके उणा आशीर्वाद पाते है|नाग भगवान शंकर के आभूषण है तथा उनके गले में लिपटे रहते है| शास्त्रों के अनुशार हमारी पृथ्वी का भर भी शेषनाग के फॅन पर टीका है,भगवान विष्णु तो शेषनाग की शय्या पर क्षीर सागर में श्य्न करते है| मान्यता है की जब जब भगवान ने धरती पर अवतार लिया है शेषनाग भी उनके साथ किसी ना किसी रूप में अवतरित होये है| रामअवतार में वे भाई लक्ष्मण बनकर और कृष्णावतार में वे भाई बलराम बनकर साए की तरह प्रभु के साथ रहे है| वासुदेव जब नन्हे कृष्ण को लेकर गोकुल जाने के लिए यमुना पार कर रहे थे तो भगवान श्रीकृष्ण के सिर पर नागफनों की छाया करके नाग देवता ने ही उन्हे भारी वर्षा से बचाया था| विभूति योग का वर्णन करते होये भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को बताया था की सापों में वासुकी एव नागों मे शेषनाग में मैं हूँ| इससे स्पष्ट है की नाग विभूति योग सम्पन्न है तथा हमारी संस्कृति में उन्हे देवत्त प्राप्त है|
क्यों मनाई जाती है नाग पंचमी
शास्त्रो के अनुसार सावन मास की पंचमी को सभी नाग सृष्टि के रचयता ब्रह्मा जी से मिलने गये थे,तथा उसी दिन उन्हे श्राप से मुक्ति मिली थी| वारा पुराण के अनुसार ब्रह्मा जी ने अपनी कृपा से शेषनाग को अलंकृत किया था| तब से धरती का भार धारण करने की सेवा लेने पर लोगों ने नाग देवता के प्रति आभार व्यक्त करते होये उनका विधिवत पूजन किया तथा उसी परंपरा के अंतरगत् हर साल नाग पंचमी पर नागों की पूजा विधिपूर्वक की जाती है| नागदेवता का आशीर्वाद पाने के इए मंदिरो में नाग पनचमी के दिन नागों की पूजा करने की मान्यता है तथा इस दिन नागमूर्तियों,को पंचामृत से स्नान करने की परम्परा है|


कैसे करें व्रत व पूजन
नाग पंचमी पर न केवल नाग देवता की पूजा की जाती है बलकी घर की सुख समर्द्दि और खुशहाली के लिए लोग नाग पंचमी को व्रत भी रखते है| इस व्रत को पंचमी से एक दिन पहले यानी चतुर्थी के दिन (31 जुलाइ) संकल्प करके एक समय भोजन कर के किया जाता है| पंचमी के दिन उपवास रखे, गरुड़ पुराण के अनुसार व्रती अपने घार के मुख्य द्दार के दोनो और गोबर से फनियर नागों के चित्र बनाए तथा आटे अथवा मिट्टी के साप बनाकर उन्हे विभिन्न रंगों से सजाए तथा उनका विधिवत सफेद कमाल के पुष्पों से पूजन करे|
पंचम तिथि का स्वामी नाग माना जाता है इसलिए नाग पंचमी के दिन धूप,दीप,खीर,भीगे होये बाजरे ,गीयी व नेवेध आदि से “नागरजाय नम:” मंत्र का उच्चारण और नाग्स्तोत्र का पाठ करते होये नाग देवता का पूजन करना चाहिए| उस दिन गेहूँ,भुने होये चने और जौ का प्रसाद नागों को चडाएँ तथा आप भी इन्ही चीज़ो का भोजन करें और प्रसाद के रूप में वितरण करें|नागों को भोजन कराने के उद्देशय से ब्रहमणो और सन्यासियों को भोजन कराए तथा सापों में जाकर दूध से नागदेवता का अभिषेक करे उन्हे मीठा दूध पिलाने के लिए रखे|
कर्मकांडों में किसी नये भवन निर्माण आदि का शिलान्यास करने में नागदेवता का पूजन वास्तु देवता के रूप में भी किया जाता है|जिन जातकों की कुंडली में कालसर्पदोष है तथा जिनके राहु , केतु का दोष है, नाग देवता की पूजा करके उन्हे प्रसन्न कर सकते है|


चतुर्मास का माहात्म्य

आषाढ़ माह में देव्स्यन एकादशी से कार्तिक माह में हरी प्रबोधिनी एकादशी अर्थात आषाढ़ शुक्ल एकादशी तक चार माह श्रावण,भाद्रपद,आस्विनि व कार्तिक माह को चतुर्मास कहते है|चतुर्मास में आधे से अधिक मुख्य त्यौहार पड़ते है| मुख्य पर्व : गुरु पूर्णिमा,नाग पंचमी, कृष्ण जन्माष्टमी,रक्षा बंधन,हरीतीज़,गणेश च्तुर्थी,श्राद्द,नवरात्रि,दशहरा,शरद पूर्णिमा,करवाचौथ,आहोई अष्टमी,धनतेरस,दीपावली,गोवर्धन ,भैयादूज व छठ पूजन|श्रावणमाह में पूर्णिमा के दिन चंद्रमा श्रावण नक्षत्र में होता है ,इसलिए इस माह का नाम श्रावण है|यह माह अति शुभ माह माना जाता है|इस माह में प्रत्येक् सोमवार को श्रावण सोमवार कहते है| इस दिन विशेष रूप से शिवलिंग पर जल चढ़ाया जाता है| कहते है श्रावण मास में ही समुंदर मंथन से ही 14 रतन प्राप्त होये थे जिसमे एक था हलाहल विष| जिसको शिवजी ने अपने गले में स्थापित कर लिया था जिससे उनका नाम नीलकंठ पड़ा|विष के जलन को रोकने के लिए सब देवताओं ने उन पर गंगा जल डाला| तभी से श्रावण मास में श्रद्दालु तीर्थ स्थल से गंगाजल लाकर शिव जी पर डालते है|कहते है की उतरायण के 6 माह देवताओं के लिए दिन होते है और दक्षिणायन के 6 माह उनके लिया रात होती है| ये चार माह भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते है| अत: सभी संत इस समय में व्रत का पालन करते है| इस समय ब्रहम्चर्य का पालन करते होये तामसिक वस्तुओं का त्याग किया जाता है | चार माह ज़मीन पर सोते होये भगवान विष्णु की आराधना की जाती है|विष्णु सहस्रनां का पाठ किया जाता है|पुराणो में ऐसा उल्लेख है की इस दिन से भगवान विष्णु चार माह की अवधि तक क्षीर सागर की अनंत शय्या पर शयन करते है|इसलिए इन चार माह में कोई भी धार्मिक काम ना किया जाता है| ईयेज़ अवधि में कृषि और विवाह सभी शुभ कार्य नही होते| इन चार माह में सभी देव एकत्रित होकर ब्रज भूमि में निवास करते है|कुछ लोगो का ऐसा भी मानना है की  चतुर्मास में वर्षा का मौसम हाओटा है|कहते है की इन दिनों स्नान अगर किसी तीरथ स्थल या पवित्र नदी में किया जाए तो वह विशेष रूप से शुभ होता है| स्नान पश्चात श्री विष्णु जी का पूजन करना चाहिए| इसके लिए  के उपर लाल रंग के वस्त्र में लिपटे कुंभ रखकर उस पर भगवान की प्रतिमा रखकर पूजा करनी चाहिए| धूप दीप एव पुष्प से पूजा कर ‘नमो नारायण’ या ” उँ नमो भग्व्ते वासुदेवाय” का जप करना चाहिए सभी कष्टों से मुक्ति व मोक्ष मिलता है|चतुर्मास का प्रारभ अर्थात देवसायंन एकादसी व इसका अंतिम दिन हरी प्रबोधिनी दोनो ही दिन अन्बुझ मुहूर्त है कोई भी शुभ कार्य विवाह, ग्रह प्रवेश आदि किए जा सकते है|जो मनुष्य केवल शाकाहार करके चतुर्मास व्यतीत करता है,वह धनी हो जाता है| जो प्रतिदिन तारे देखने के बाद एक बार भोजन करता है , वह धनवान ,रूपवान और गणमान्य होता है| जो चतुर्मास में एक दिन का अंतर करके भोजन करता है,वह बैकुंठ जाने का अधिकारी होता है| जो मनुष्य चतुर्मास में तीन रत उपवास करके चौथे दिन भोजन करता है वह पून्जनम नही लेता| जो पाँच दिन उपवास रख के छठे दिन भोजन करता है उसे राजसूय तथा अश्वमेध यगों का फल मिलता है| जो व्यक्ति भगवान मधुसूदन के सायंकाल में अयाचित अन्न का सेवन करता है उसका अपने भाई बंधुओ से कभी विलाप नही होता| चौमासे में विष्णुसुक्त के मंत्रो में स्वाहा संयुक्त करके नित्य हवन में तिल और चावल की आहूतियाँ देने वाला आजीवन स्वस्थ व निरोगी रहता है| चतुर्मास में प्रतिदिन भगवान विष्णु के समक्ष पुरुषसुक्त का जान करने स बुद्धि कुशाग्र होती है | हाथ में फल लेकर जो  मौन रहकर भगवान नारायण की नित्य 108 परिक्रमा करता है कभी पाप में लिप्त नही होता| चौमासे के चार महीनों में धर्मग्रहंतों के स्वाध्याय से बड़ा फल मिलता है| श्रीहरी के सायंकाल में वैष्णव को अपनी किसी प्रिय वस्तु का त्याग करने से जिस वस्तु को त्यागत है उसे अक्ष्य ऊप मे प्राप्त होता है| चतुर्मास आध्यात्मिक साधना का पर्व है जिसका सदुपयोग आत्मोन्न्ति हेतु करना चाहिए|

विवाह के लिए विशेष म्हत्वपूर्ण गुरु , शुक्र और मंगल

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हमारे शास्त्रों में 16 संस्कार बताए गये है जिनमे विवाह सबसे म्हत्वपूर्ण संस्कार है| हमारे समाज में जीवन को सुचारू रूप से चलाने के लिए और वंश को आयेज बढ़ाने के लिए विवाह करना आवश्यक माना गया है|जब हम कुंडली में विवाह का विचार करते है तो उसके लिए 9 ग्रहों में से सबसे म्हत्वपूर्ण ग्रह गुरु , शुक्र और मंगल का विस्लेश्न करते है| इन तीनों ग्रहों का विवाह में विशेष भूमिका होती है| यदि किसी का विवाह नही हो रहा हो या दांपत्य जीवन टिक नही चल रा हो तो निस्चित रूप से कहा जा सकता है की उसकी कुंडली में गुरु , शुक्र और मंगल की स्थिति ठीक नही है|

गुरु :  वर-वधू की कुंडली में गुरु ग्रह बलि होना चाईए| गुरु की शुभ दृष्टि यदि सप्तम भाव पर होती है तो विवाहिक जीवन में परेशानियों के बाद भी अलगाव की स्थिति नही बनती अर्थात गुरु की शुभता वर-वधू की शादी को बांधें रखता है| गुरु ग्रह शादी के साथ-साथ संतान का कारक भी है| अत: यदि गुरु बलहीन होगा तो शादी के बाद संतान प्राप्ति में भी परेशानी होगी|
अत: हमे कुंडली में मुख्य रूप से गुरु को सबसे पहले देखना चाहिए| गुरु यदि बलि है या उच्च राशि में है, केंद्र या त्रिकोण में है तथा शुभग्रह से प्रभावित है तो जातक के शादी में परेशानी नहीं आती है और जातक की शादी समय से हो जाती है|

शुक्र: गुरु ग्रह जहा शादी करवाते है वहीं शुक्र ग्रह शादी का सुख प्रदान करते है| कई बार देखा गया है की शादी तो समय पर हो जाती है लेकिन पति को पत्नी सुख और पत्नी को पति सुख का अभाव रहता है| किसी न किसी कारण वश पति-पत्नी एक साथ नहीं रह पाते और अगर रहते है तो ब उन्हें श्य्या सुख प्राप्त नही हो पाता| यदि आपके जीवन में ऐसी स्थिति है तो समाज लेना छाईए की आपका शुक्र ग्रह पीड़ित है अर्थात शुक्र पापी ग्रह से पीड़ित और कमजोर है| अत: हमे विवाह का पूर्ण सुख लेने के लिए शुक्र की स्थिति का आकलन जरूर कर लेना चाहिए| शुक्र की शुभ स्थिति दांपत्य जीवन के सुख को प्रभावित करती है अर्थात यदि शुक्र स्व्य हो,उच्च राशि मे स्थित हो,केंद्र या त्रिकोण में हो तब विवाहिक जीवन का शुख प्राप्त होता है| इसके विपरीत जब त्रिक .भाव ,नीच या शत्रु क्षेत्री,अस्त ,पापी ग्रह से दृष्ट अथवा पापी ग्रह के साथ बैठा हो तब दांपत्य जीवन के लिए अशुभ योग बनता है| अत: कुंडली में शुक्र की स्थिति का अवलोकन ज़रूर करना चाहिए|



मंगल: मंगल के अध्ययन किए बिना विवाह के पक्ष से कुंडलियों का अध्ययन अधूरा ही रहता है| वर-वधू की कुंडलियों का विश्लेषण करते समय पहले कुंडली में मंगल की भूमिका का विचार ज़रूर करना चाहिए की मंगल किन भावों में स्थित है कौन से ग्रहों से दृष्टि संबंध बना रहे है तथा किन भावों और ग्रहों पर इनकी दृष्टि है|
मंगल से मांगलिक योग का निर्माण होता है| यदि कुंडलीं में प्रथम ,चतुर्थ,सप्तम,अष्टम और द्वादश भाव में मंगल होता है तो कुंडली मांगलिक कहलाती है क्योंकि इन घरों में बैठकर मंगल सप्तम भाव को प्रभावित करता है|अत: कुंडली में मंगल की स्थिति टिक होनी ज़रूरी है क्योंकि मंगल की अशुभ स्थिति विवाहिक जीवन के सुख में कमी लाता है|